मितत्रता पवित्र सम्बन्ध है। ये मनुष्य की मूल आवश्यकताओ भोजन, वस्त्र इत्यादि की तरह ही महत्वपूर्ण है। अपने सुख-दुख को हम अपने मित्रो को शेअर करके जीवन की जटिलता को सरलता मे परवर्तित कर सकते है। मित्र के दुख को अपना दुख समझ उसे यथा सम्भव दूर करने का प्रयत्न करना एक अच्छे मित्र के लक्षण है। इतिहास मे कृष्ण सुदामा मैत्री यही दर्शाती है कि वैभव पा कर भी अपने मित्रो को नही भूलाना चाहिए।
MAKE NEW FIRENDS BUT DONOT FORGET OLD
THESE ARE SILVER THOSE ARE GOLD.
परन्तु आजकल मितत्रा के मायने बदलते जा रहे है। मित्रता का गलत अर्थ किया जा रहा है। भाई-बहन के रूप में भी तो मितत्रा की जा सकती है। भाई-बहन का रिश्ता सर्वाधिक पवित्र,निस्वार्थ रिश्ता है। एक बार की बात है, कि एक महिला जगंल मे राह भटक जाती है। एक व्यक्ति उधर से गुजरता है और महिला से कहता है कि आओ मै तुम्हे जगंल से बाहर कर दूं। महिला अन्जान व्यक्ति को देख घबराई, तब उस व्यक्ति ने कहा घबराओ मत मुझे अपने पिता के रूप में स्वीकार करो। महिला ने कहा पिता तो अपनी पुत्री को अपने लिए भारस्वरूप समझता है। तो मुझे अपने पति रूप में स्वीकार करो। पति तो महा-स्वार्थी होता है, महिला ने कहा । चलो मुझे पुत्र रूप में स्वीकार करो। नही पुत्र विवाह के पश्चात अपनी मां को कहां याद रखता है। अच्छा फिर मुझे अपने भाई के रूप में स्वीकार करो। यह प्रस्ताव उस महिला ने स्वीकार कर लिया और यही सत्य दोहराया- भाई-बहन का रिश्ता सर्वाधिक पवित्र-निस्वार्थ रिश्ता है। आपने विज्ञापन पढे होगें--आवश्यकता है एक महिला मित्र की। परन्तु क्या कभी यह विज्ञापन पढा है।आवश्यकता है एक भाई या बहन की। तो इस विज्ञापन का आरम्भ हम कर रहे है, इस मित्रता स्तम्भ पन्ने के माध्यम से-आप सभी भाई-बहनो का स्वागत है। आप का भाई- गुरूचरणाश्रित---गुरमुख आजाद
श्री आनन्द पुर सत्संग आश्रम
48/18 लक्ष्मी गार्डन
गुड्गांव-122001
http://gurmukhazad.blogspot.com/
फोन-0124-2302690
मुख्य स्थान
मेल- gurmukhazad@yahoo.com
फोन-0124-2302690
मुख्य स्थान
